Sharada Class 9 Chapter 2 PDF: सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः (द्वितीयः पाठः)

Sharada Class 9 Sanskrit Chapter 2, सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः, is based on Kautilya’s famous aphorism from the Arthashastra explaining how righteous conduct (dharma) is the root of happiness, and ethically earned wealth (artha) is the foundation that enables a person to fulfil duties towards family and society.

Sharada Class 9 Chapter 2 (सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः): पाठ-सार और मुख्य बिंदु

कौटिल्य अर्थशास्त्र का सूत्र पाठ स्पष्ट करता है कि अन्न, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य-सेवा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं तथा दान व सेवा जैसे कर्तव्यों के पालन के लिए न्यायपूर्वक अर्जित धन (अर्थ) आवश्यक है।

धर्म, अर्थ और सुख का परस्पर संबंध चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में धर्म के अनुकूल अर्थोपार्जन करने से ही व्यक्ति और समाज को वास्तविक सुख तथा संतुलन प्राप्त होता है।

धन क्यों आवश्यक है पाठ बताता है कि भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूल आवश्यकताओं के लिए धन चाहिए। पर्याप्त धन के अभाव में अपने कर्तव्यों का पालन कठिन हो जाता है, सेवा और दान जैसे कार्य रुक जाते हैं। जो व्यक्ति न्यायपूर्वक धन कमाता है, वही धर्म का पालन कर पाता है और उससे दीर्घकालिक सुख पाता है।

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FAQ

‘सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः’ यह सूक्ति किस ग्रंथ से ली गई है?
यह प्रसिद्ध सूत्र आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) के ‘अर्थशास्त्र’ से लिया गया है।

इस पाठ में ‘अर्थः’ शब्द का क्या आशय है?
यहाँ ‘अर्थः’ का आशय न्यायपूर्वक अर्जित धन और आजीविका के साधनों से है, जिससे धर्म और कर्तव्यों का पालन संभव होता है।

‘सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः’ सूत्र किस ग्रंथ का है?
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का।