Sharada Class 9 Sanskrit Chapter 12 (Appendix 1, ihsh112.pdf), अन्वयः (Anvayah – परिशिष्टम् १), teaches students the step-by-step method of rearranging Sanskrit verse words into natural prose order using Dandanvaya and Khandanvaya.
Sharada Class 9 Chapter 12 (अन्वयः (परिशिष्टम् १)): पाठ-सार और मुख्य बिंदु
अन्वय की आवश्यकता श्लोकों में छन्द के कारण कर्ता, कर्म, क्रिया और विशेषण आगे-पीछे हो जाते हैं, इसलिए पढ़ने वाले को पदों का परस्पर सम्बन्ध (अन्वय) समझने में कठिनाई होती है। अन्वय की दो विधियाँ हैं: दण्डान्वय और खण्डान्वय।
दण्डान्वयविधि ‘आद्ये विशेषणं योज्यं विशेष्यं तदनन्तरम्’: पहले विशेषण, फिर विशेष्य रखा जाता है। क्त्वा, णमुल् और ल्यप् वाले पद मुख्य क्रिया से पहले आते हैं, तृतीया आदि विभक्ति वाले पद अपने सम्बद्ध पद के साथ जुड़ते हैं, और अन्त में क्रियापद लिखा जाता है।
उदाहरण-श्लोक ‘शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषस्स विद्वान्।’ पहले पदच्छेद होता है, फिर अन्वय: ‘(केचन) शास्त्राणि अधीत्यापि मूर्खाः भवन्ति। यः क्रियावान् सः पुरुषः तु विद्वान् (भवति)।’ श्लोक में न लिखे गए ‘केचन’, ‘भवति’ और ‘यथा’ अर्थ पूरा करने के लिए जोड़े जाते हैं; इसे अध्याहार कहते हैं।
प्रश्नोत्तर से अन्वय अध्यापक पदच्छेद के बाद श्लोक के 19 पदों को क्रमांक देकर प्रश्न पूछते हैं और छात्र पदों को क्रम से जोड़कर अन्वय बनाते हैं।
खण्डान्वयविधि ‘कर्तृ-कर्म-क्रियास्तावच्छ्लोके योज्यास्ततः परम्।’ इसमें पूरे श्लोक का एक साथ अन्वय नहीं होता, बल्कि कर्ता, कर्म और क्रिया से आरम्भ करके कः, किम्, कथम् जैसे प्रश्नों से हर पद का अलग-अलग सम्बन्ध जोड़ा जाता है।
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FAQ
श्लोक का अन्वय करने की दो प्रमुख विधियाँ कौन-सी हैं?
दण्डान्वयविधि और खण्डान्वयविधि।
अध्याहार किसे कहते हैं?
श्लोक में न लिखे गए किसी पद (जैसे ‘केचन’ या ‘भवति’) को अर्थ पूरा करने के लिए अन्वय में जोड़ना।