Sharada Class 9 Sanskrit Chapter 6, मनःपूतं समाचरेत् (‘One should act with a pure mind’), teaches that any action yields good fruit only when both the intention and the method are pure and honest.
Sharada Class 9 Chapter 6 (मनःपूतं समाचरेत्): पाठ-सार और मुख्य बिंदु
पवित्र मन और सद्-उद्देश्य का महत्त्व आचार्य और छात्रों के संवाद से पाठ आरंभ होता है कि किसी भी कार्य को करने के लिए विचारपूर्वक निर्णय, उचित विधि और पूर्ण मन के साथ-साथ ‘पवित्र उद्देश्य’ का होना सबसे आवश्यक है।
आचरण में शुचिता यदि मन ही मलिन हो या उद्देश्य अनुचित हो, तो कार्य का परिणाम भी दूषित होता है; इसलिए मनुष्य को सदैव अंतःकरण से पवित्र माना गया आचरण करना चाहिए (‘मनःपूतं समाचरेत्’)।
पाठ के सुभाषित पाठ विभिन्न ग्रंथों से संकलित सुभाषितों का संग्रह है। मनुस्मृति (6.46) का श्लोक ‘दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥’ कहता है कि देखकर कदम रखो, छानकर पानी पियो, सत्य से पवित्र वाणी बोलो और शुद्ध मन से आचरण करो। मनुस्मृति (6.92) धर्म के दस लक्षण बताती है: धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध। ‘यद्यदाचरति श्रेष्ठः’ जैसे श्लोक बताते हैं कि श्रेष्ठ लोगों का आचरण दूसरों के लिए आदर्श बनता है।
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FAQ
‘मनःपूतं समाचरेत्’ का हिंदी अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है—‘मन से पवित्र (शुद्ध अंतःकरण से युक्त) आचरण करना चाहिए’।
किसी कार्य के सफल और कल्याणकारी होने के लिए क्या आवश्यक है?
विचारपूर्वक कार्य करना, उचित विधि अपनाना और मन तथा उद्देश्य का पवित्र होना।
मनुस्मृति के अनुसार धर्म के दस लक्षण कौन-से हैं?
धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध।