Class 7 Social Science Chapter 11 in Hindi PDF: वस्तु विनिमय से मुद्रा तक (समाज का अध्ययन)

कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 11, वस्तु विनिमय से मुद्रा तक: यह अध्याय प्राचीन काल की वस्तु विनिमय प्रणाली (बार्टर सिस्टम) से लेकर सिक्कों, कागजी मुद्रा तथा यूपीआई जैसी आधुनिक डिजिटल मुद्रा के विकास का अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें एक किसान द्वारा जूते, स्वेटर और दवाओं के बदले बैल व गेहूं के विनिमय की कहानी, फल विक्रेता कृष्णप्पा के डिजिटल भुगतान, असम के ‘जोन बील मेले’ तथा याप द्वीप के ‘राई पत्थर’ का उल्लेख किया गया है।

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कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 11 (वस्तु विनिमय से मुद्रा तक): मुख्य बिंदु

वस्तु विनिमय प्रणाली और इसकी सीमाएँ प्राचीन काल में मुद्रा के बिना वस्तुओं का आदान-प्रदान ‘वस्तु विनिमय प्रणाली’ कहलाता था जहाँ कौड़ी, नमक, चायपत्ती और पशुधन (गाय, बकरी, बैल) का उपयोग होता था। इस प्रणाली में ‘आवश्यकताओं का द्विसंयोग’, मूल्य के सामान्य मानक माप की कमी, अविभाज्यता, सुवाह्यता और टिकाऊपन जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती थीं।

जोन बील मेला — वस्तु विनिमय का जीवंत उदाहरण असम के मोरीगांव जिले में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला तीन दिवसीय ‘जोन बील मेला’ 15वीं शताब्दी से चली आ रही वस्तु विनिमय परंपरा का अनूठा उदाहरण है। यहाँ तिवा, कारबी, खासी और जयंतिया जनजातियों के लोग पहाड़ी कंद-मूल, जड़ी-बूटियाँ व मसालों का विनिमय मैदानी क्षेत्रों के चावल के पीठा (राइस केक) से करते हैं।

सिक्का-प्रणाली और प्राचीन मुद्रा प्राचीन भारत में सोने, चाँदी व तांबे को ढालकर ‘काषापण’ या ‘पण’ नामक सिक्के बनाए जाते थे जिन पर उकेरे गए चिह्नों को ‘रूपा’ कहा जाता था। कल्याणी के चालुक्य सिक्कों पर वराह (विष्णु अवतार) तथा चोल सिक्कों पर बाघ का प्रतीक अंकित मिलता है, जबकि तमिलनाडु के पुड्डुकोट्टाई में उत्खनन से ग्रीक व रोमन सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

कागजी और डिजिटल मुद्रा का आगमन कागजी मुद्रा का सर्वप्रथम प्रयोग चीन में तथा भारत में 18वीं शताब्दी के अंत में हुआ, जिसे वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक जारी करता है और 2010 में आईआईटी बॉम्बे के डी. उदय कुमार द्वारा निर्मित ‘₹’ चिह्न को स्वीकार किया गया। आधुनिक काल में फल विक्रेता कृष्णप्पा जैसे लोग क्यूआर कोड स्कैनर, कार्ड तथा यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के माध्यम से सीधे बैंक खातों में डिजिटल भुगतान प्राप्त करते हैं।

अध्याय 11 के अभ्यास

  • विद्यार्थी अपने परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों और दुकानदारों से पुराने सिक्के एकत्र करके उनके धातु, अंकित वर्ष, शीर्ष और पृष्ठ भाग की विशेषताओं की एक सूची बनाते हैं।
  • विद्यार्थी कौड़ी या कंचों को विनिमय का माध्यम बनाने पर सहमति व्यक्त करने वाले लोगों के व्यवहार पर एक लघु नाटक लिखकर उसका मंचन करते हैं।
  • विद्यार्थी परिवार के सदस्यों और स्थानीय दुकानदारों का साक्षात्कार लेकर यह पता लगाते हैं कि वे भुगतान करने या प्राप्त करने में नकद या यूपीआई में से किसे वरीयता देते हैं।

कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 11 के प्रश्न-उत्तर (हल)

प्रश्न 1. वस्तु विनिमय प्रणाली कैसे कार्य करती थी और इस प्रणाली में किस प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग विनिमय हेतु किया जाता था?
उत्तर: वस्तु विनिमय प्रणाली में लोग मुद्रा का प्रयोग किए बिना अपनी वस्तुओं और सेवाओं का सीधे एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते थे
इस प्रणाली में कौड़ी, नमक, चायपत्ती, तंबाकू, कपड़ा, पशुधन (गाय, बकरी, घोड़े, भेड़) और बीज जैसी वस्तुओं का प्रयोग विनिमय हेतु किया जाता था।

प्रश्न 2. वस्तु विनिमय प्रणाली की क्या सीमाएँ थीं?
उत्तर: वस्तु विनिमय प्रणाली की मुख्य सीमाएँ थीं— आवश्यकताओं के द्विसंयोग की अनिवार्यता, मूल्य के सामान्य मानक माप का अभाव, वस्तुओं की अविभाज्यता, सुवाह्यता (एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने) की कठिनाई तथा टिकाऊपन (दीर्घकालिक संग्रहण) की समस्या।

प्रश्न 3. प्राचीन भारतीय सिक्कों की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: प्राचीन भारतीय सिक्के सोने, चाँदी, ताँबे या उनकी मिश्रधातु से ढाले जाते थे जिन्हें 'काषापण' या 'पण' कहा जाता था
इन पर उकेरे गए चिह्नों को 'रूपा' कहा जाता था तथा इनके शीर्ष एवं पृष्ठ भाग पर जानवरों, वृक्षों, पहाड़ियों, राजा-रानियों व देवी-देवताओं की आकृतियाँ अंकित होती थीं।

प्रश्न 4. समय के साथ मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कैसे परिवर्तित हुई?
उत्तर: मुद्रा का विकास वस्तु विनिमय प्रणाली से प्रारंभ होकर गैर-धातु मुद्रा (कौड़ी, अनाज), धातु के सिक्कों (सोना, चाँदी, ताँबा), कागजी नोटों तथा आधुनिक समय में डेबिट/क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग और यूपीआई (UPI) जैसी डिजिटल मुद्रा के रूप में परिवर्तित हुआ।

प्रश्न 5. आवश्यकताओं का द्विसंयोग (Double Coincidence of Wants) क्या है?
उत्तर: आवश्यकताओं का द्विसंयोग वह स्थिति है जहाँ एक व्यक्ति के पास ऐसी वस्तु होती है जिसकी दूसरे व्यक्ति को आवश्यकता है और दोनों बिना किसी मध्यवर्ती मुद्रा के सीधे एक-दूसरे से अपनी वस्तुओं का विनिमय करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

प्रश्न 6. असम का 'जोन बील मेला' क्यों प्रसिद्ध है और यहाँ किस परंपरा का पालन किया जाता है?
उत्तर: असम के मोरीगांव जिले में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला तीन दिवसीय जोन बील मेला 15वीं शताब्दी से चली आ रही वस्तु विनिमय परंपरा के लिए प्रसिद्ध है
यहाँ पहाड़ी जनजातियों के लोग कंद-मूल, जड़ी-बूटियाँ और मसाले लाकर मैदानी क्षेत्र के लोगों से चावल के पीठा (राइस केक) के साथ विनिमय करते हैं।

प्रश्न 7. 'सिक्के ढालना' (Minting) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: सिक्के ढालना (मिंटिंग) वह प्रक्रिया और विनिर्माण सुविधा है जिसके द्वारा सिक्कों का आधिकारिक उत्पादन किया जाता है ताकि उनका प्रयोग राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में लेन-देन हेतु किया जा सके।

प्रश्न 8. भारतीय रुपये के '₹' चिह्न को कब स्वीकृत किया गया और इसे किसने डिजाइन किया था?
उत्तर: भारतीय रुपये के '₹' चिह्न को वर्ष 2010 में भारत सरकार द्वारा स्वीकृति दी गई और इसे आईआईटी बॉम्बे के डी. उदय कुमार द्वारा डिजाइन किया गया था।

प्रश्न 9. कागजी मुद्रा का सर्वप्रथम प्रयोग कहाँ हुआ था और भारत में इसे कब लाया गया?
उत्तर: कागजी मुद्रा (करेंसी) का सर्वप्रथम प्रयोग चीन में हुआ था तथा भारत में इसे 18वीं शताब्दी के अंत में प्रयोग में लाया गया था।

प्रश्न 10. भारत में मुद्रा जारी करने का वैधानिक अधिकार किस संस्था के पास है?
उत्तर: भारत में मुद्रा (कागजी नोट) छापने और वितरण करने का एकमात्र वैधानिक अधिकार देश के केंद्रीय प्राधिकरण 'भारतीय रिजर्व बैंक' (RBI) के पास है।

प्रश्न 11. डिजिटल मुद्रा क्या है और इसके लेन-देन के प्रमुख माध्यम कौन-कौन से हैं?
उत्तर: डिजिटल मुद्रा इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध अमूर्त मुद्रा है जिसे भौतिक रूप से छुआ नहीं जा सकता
इसके लेन-देन के प्रमुख माध्यम डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, क्यूआर कोड (QR Code), नेट बैंकिंग और यूपीआई (UPI) हैं।

कक्षा 7 अध्याय 11 PDF ऑनलाइन पढ़ें

अन्य अध्याय

FAQ

वस्तु विनिमय प्रणाली में ‘आवश्यकताओं का द्विसंयोग’ (Double Coincidence of Wants) क्या है?
आवश्यकताओं का द्विसंयोग वह स्थिति है जहाँ एक व्यक्ति के पास ऐसी वस्तु होती है जिसकी दूसरे व्यक्ति को आवश्यकता है और दोनों बिना किसी मुद्रा के सीधे एक-दूसरे से विनिमय करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

भारतीय रुपये के ‘₹’ चिह्न को किसने डिजाइन किया और इसमें क्या विशेषताएँ हैं?
रुपये के ‘₹’ चिह्न को 2010 में आईआईटी बॉम्बे के डी. उदय कुमार ने डिजाइन किया था। यह देवनागरी के ‘र’ और रोमन अक्षर ‘R’ का मिश्रण है, जिसकी दो क्षैतिज रेखाएँ राष्ट्रीय ध्वज और ‘बराबर’ के प्रतीक का प्रतिनिधित्व करती हैं।

असम का ‘जोन बील मेला’ क्यों प्रसिद्ध है?
असम के मोरीगांव जिले का तीन दिवसीय जोन बील मेला 15वीं शताब्दी से चली आ रही वस्तु विनिमय परंपरा का अनूठा रूप है। इसमें पहाड़ी जनजातीय लोग कंद-मूल, जड़ी-बूटियाँ व मसाले लाकर मैदानी क्षेत्र के लोगों से चावल के पीठा के साथ विनिमय करते हैं।

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