Class 7 Sanskrit Chapter 8, हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः, from NCERT Deepakam (दीपकम्), is a collection of ten sooktis (wise sayings), each explained with पदच्छेद, अन्वय and भावार्थ.
Class 7 Sanskrit Chapter 8 (हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः): पाठ-सार और मुख्य बिंदु
सूक्तियाँ ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’, ‘न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत्’ (गुण होंगे तो गुणज्ञ स्वयं खोजेंगे), ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’, ‘क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्’, ‘सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम्’।
और सूक्तियाँ ‘गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः’, ‘मा ब्रूहि दीनं वचः’, ‘यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्’ (ज्ञानं भारः क्रियां विना), ‘शीलं परं भूषणम्’ और पाठ का शीर्षक ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’—ऐसा वचन दुर्लभ है जो हितकारी भी हो और मन को भी अच्छा लगे।
Chapter 8 Exercises (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
- आम्/न: किं रत्नम् अन्विष्यति? किं शीलं श्रेष्ठम् आभूषणम् अस्ति?
- एक पद में उत्तर: आद्यं धर्मसाधनं किम्? सर्वेषां मनुष्याणां माता का अस्ति?
- पूर्ण वाक्य में उत्तर: कः विद्वान् अस्ति? गुणिषु पूजास्थानं किम्?
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FAQ
‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ का अर्थ क्या है?
शरीर ही धर्म (कर्तव्य) के पालन का पहला साधन है, इसलिए शरीर को स्वस्थ रखना चाहिए।
‘क्षणत्यागे कुतो विद्या, कणत्यागे कुतो धनम्’ का भाव?
एक-एक क्षण का उपयोग करने से विद्या और एक-एक कण (रुपया) जोड़ने से धन मिलता है; इन्हें व्यर्थ करने वाले को दोनों नहीं मिलते।
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