कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 4, नवारंभ— नगर एवं राज्य: यह अध्याय प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में गंगा के मैदानी भागों में भारत के ‘द्वितीय नगरीकरण’, जनपदों और 16 महाजनपदों के उदय तथा उनकी राजनीतिक व सामाजिक प्रणालियों का अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र के उद्धरण, मगध की राजधानी राजगृह (राजगीर), वज्जि व मल्ल गणराज्यों, चाँदी के आहत सिक्कों, लौह धातुकर्म तथा शिशुपालगढ़ की दुर्गबंदी का उल्लेख किया गया है।
कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 4 (नवारंभ— नगर एवं राज्य): मुख्य बिंदु
जनपद एवं महाजनपद 8वीं या 7वीं शताब्दी सा.सं.पू. में जनपदों के संगठित होने से 16 महाजनपदों का गठन हुआ जो उत्तर-पश्चिम में गांधार से पूर्व में अंग तथा अश्मक तक विस्तृत थे। इनकी राजधानियों में सुरक्षा हेतु विशाल दुर्ग प्राचीरें, पानी से भरी गहरी परिखा (खाई) और नियंत्रण हेतु संकरे प्रवेश द्वार बनाए जाते थे।
प्रारंभिक लोकतांत्रिक परंपराएँ जनपदों में ‘सभा’ या ‘समिति’ नामक परिषदें होती थीं जो कुल के विषयों पर विचार-विमर्श करती थीं और अयोग्य राजा को पदच्युत भी कर सकती थीं। जहाँ मगध, कोसल और अवंति में राजतंत्रात्मक शासन था, वहीं वज्जि तथा मल्ल में सभा द्वारा राजा का चयन एवं मतदान द्वारा निर्णय लेने वाली गणतांत्रिक व्यवस्था विद्यमान थी।
कुछ अन्य नवीन प्रयोग द्वितीय सहस्राब्दी सा.सं.पू. के अंत में लोहे के कृषि उपकरणों के प्रयोग से खेती का विस्तार हुआ तथा भाले, तलवार और तीर जैसे प्रभावी हथियार बनाए जाने लगे। व्यापार के विकास हेतु भारत में पहली बार चाँदी जैसी नरम धातु पर प्रतीकों को अंकित करके आहत सिक्के जारी किए गए।
वर्ण-जाति व्यवस्था और अन्य विकास भारतीय समाज में पेशों व हस्तकला से जुड़ी ‘जाति’ तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र जैसे चार ‘वर्ण’ संगठित हुए, जिन्हें 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली यात्रियों ने ‘कास्टा’ शब्द से संबोधित किया। इसी काल में उत्तरापथ और दक्षिणापथ जैसे प्रमुख व्यापारिक मार्गों का विकास हुआ तथा कलिंग की राजधानी शिशुपालगढ़ जैसे सुनियोजित नगर उभरे।
अध्याय 4 के अभ्यास
- विद्यार्थी अध्याय के प्रारंभ में दिए गए कौटिल्य के अर्थशास्त्र के उद्धरण पर समूह में चर्चा करके राज्य की विशेषताओं पर निष्कर्ष निकालते हैं।
- विद्यार्थी इतिहासकार की भूमिका निभाते हुए महाजनपदों की जानकारी प्राप्त करने के लिए पुरातात्विक और साहित्यिक स्रोतों की सूची बनाकर उनका वर्णन करते हैं।
- विद्यार्थी प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में द्वितीय नगरीकरण हेतु लौह धातु-विज्ञान के महत्त्व का विश्लेषण करते हुए विस्तृत उत्तर लिखते हैं।
कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 4 के प्रश्न-उत्तर (हल)
प्रश्न 1. भारत में ‘द्वितीय नगरीकरण’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में गंगा के मैदानी भाग, सिंधु घाटी तथा इसके समीपवर्ती क्षेत्रों में एक नवीन एवं जीवंत नगरीकरण का चरण प्रारंभ हुआ, जिसे भारत का 'द्वितीय नगरीकरण' कहा जाता है
हड़प्पा सभ्यता (प्रथम नगरीकरण) के विघटन के बाद यह नया चरण पुरातात्विक उत्खनन और प्राचीन उत्तर-वैदिक, बौद्ध व जैन साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
प्रश्न 2. जनपदों और महाजनपदों का भारत के प्रारंभिक इतिहास में क्या महत्व है?
उत्तर: जनपदों और महाजनपदों ने प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में भारत के प्रथम संगठित राज्यों की स्थापना की
इनसे सुदृढ़ राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्था, कर-संग्रह प्रणाली, विशाल किलों से युक्त नगरों का निर्माण तथा व्यापारिक मार्गों व आहत सिक्कों का विकास हुआ जिससे सभ्यता को स्थिरता मिली।
प्रश्न 3. इन जनपदों और महाजनपदों ने किस प्रकार की शासन प्रणाली का विकास किया?
उत्तर: इन जनपदों और महाजनपदों ने दो मुख्य शासन प्रणालियों का विकास किया— राजतंत्रात्मक प्रणाली (जैसे मगध, कोसल, वत्स और अवंति में जहाँ राजा सर्वोच्च व पद प्रायः वंशानुगत होता था) तथा गणतंत्रात्मक प्रणाली या गण/संघ व्यवस्था (जैसे वज्जि और मल्ल में जहाँ सभा द्वारा राजा का चयन एवं मतदान द्वारा निर्णय लिए जाते थे)।
प्रश्न 4. पाठ के अनुसार प्रारंभिक वैदिक समाज में शासकों का चयन कैसे किया जाता था?
उत्तर: पाठ के अनुसार जनपदों में एक परिषद होती थी जिसे 'सभा' या 'समिति' कहा जाता था जिसमें कुल के वरिष्ठजन शामिल होते थे
राजा मंत्रियों व सभा-समिति के परामर्श से निर्णय लेता था और यदि कोई राजा अयोग्य होता था तो सभा द्वारा उसे पदच्युत भी किया जा सकता था।
प्रश्न 5. कल्पना कीजिए कि आप प्राचीन भारत के इतिहास का अध्ययन करने वाले एक इतिहासकार हैं। महाजनपदों के विषय में अधिक जानकारी हेतु आप कौन-कौन से स्रोतों (पुरातात्विक, साहित्यिक इत्यादि) का उपयोग करेंगे? प्रत्येक स्रोत से आपको क्या जानकारी प्राप्त हो सकती है, वर्णन करें।
उत्तर: पुरातात्विक स्रोतों (उत्खनन से प्राप्त अवशेष, किलेबंदी, परिखा, आहत सिक्के और लौह उपकरण) से नगर नियोजन, रक्षा प्राचीर, व्यापार प्रणाली और धातु विज्ञान की जानकारी मिलती है
साहित्यिक स्रोतों (उत्तर-वैदिक, बौद्ध एवं जैन साहित्य) से महाजनपदों के नाम, उनकी शासन प्रणाली, सामाजिक संरचना (वर्ण व जाति) और धार्मिक विचारों का ज्ञान प्राप्त होता है।
प्रश्न 6. प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में नगरीकरण हेतु लौह धातु-विज्ञान का विकास इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
उत्तर: द्वितीय नगरीकरण में लौह धातु-विज्ञान का विकास इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि लोहे के उपकरण कृषि में प्रयुक्त होने से कृषि उत्पादन व क्षेत्र का विस्तार हुआ
साथ ही लोहे से बने हथियार (तलवार, भाले, तीर) कांस्य की तुलना में अधिक हल्के, तीव्र व प्रभावशाली थे जिससे युद्धों, सैन्य सुरक्षा और शक्तिशाली राज्यों का गठन संभव हुआ।
प्रश्न 7. 'जनपद' शब्द का क्या अर्थ है और इसकी स्थापना किस प्रकार हुई?
उत्तर: संस्कृत में 'जनपद' का अर्थ है— "जहाँ 'जन' ने अपने पद (पग या चरण) रखे हों", अर्थात जहाँ लोग निवास करने लगे
द्वितीय सहस्राब्दी सा.सं.पू. के उत्तराार्ध में लोग कुलों या वंशों के रूप में संगठित होकर एक नियत भूभाग से जुड़ गए जिसे शासक द्वारा शासित जनपद कहा गया।
प्रश्न 8. महाजनपदों की राजधानियों की सुरक्षा हेतु क्या-क्या प्रबंध किए जाते थे?
उत्तर: महाजनपदों की राजधानियाँ विशाल एवं सुदृढ़ प्राचीरों (किले की दीवारों) से सुरक्षित होती थीं
किलेबंदी के बाहर पानी से भरी एक गहरी परिखा (खाई) बनाई जाती थी और नगर में प्रवेश व निकास पर प्रहरियों द्वारा नियंत्रण हेतु प्रवेश द्वार जान-बूझकर संकरे बनाए जाते थे।
प्रश्न 9. महाजनपद काल में 'आहत सिक्के' (Punch-Marked Coins) किस प्रकार बनाए जाते थे और इनका क्या उपयोग था?
उत्तर: व्यापार के विस्तार से भारत में प्रथम बार सिक्कों का प्रयोग शुरू हुआ, जो मुख्य रूप से चांदी जैसी नरम धातु के बने होते थे और जिन पर प्रतीकों या चिह्नों को ठप्पा मारकर (आहत करके) अंकित किया जाता था
ये आहत सिक्के महाजनपदों द्वारा जारी किए जाते थे और आंतरिक व वैदेशिक विनिमय में प्रयुक्त होते थे।
प्रश्न 10. प्राचीन भारतीय समाज में 'जाति' और 'वर्ण' व्यवस्था में क्या अंतर था?
उत्तर: 'जाति' एक ऐसा समुदाय या समूह था जिसके सदस्य किसी विशेष पेशे या जीविका (जैसे कृषि, धातुकर्म, हस्तकला) से जुड़े होते थे और यह कौशल पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता था
जबकि 'वर्ण' वैदिक ग्रंथों से उद्भूत चार वर्गों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की एक व्यापक सामाजिक संरचना थी।
प्रश्न 11. प्राचीन काल में विकसित 'उत्तरापथ' और 'दक्षिणापथ' संचार मार्गों का क्या महत्व था?
उत्तर: उत्तरापथ उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों से गंगा के मैदानों और पूर्वोत्तर भारत को जोड़ता था, जबकि दक्षिणापथ कौशांबी से विंध्य पर्वतों को पार करते हुए दक्षिण भारत की ओर जाता था
इन संचार मार्गों ने व्यापार, तीर्थयात्रा, सैन्य अभियानों और पूरे उपमहाद्वीप में लोगों, वस्तुओं व विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाया।
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FAQ
भारत में ‘द्वितीय नगरीकरण’ से क्या अभिप्राय है?
प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में हड़प्पा सभ्यता के विघटन के पश्चात गंगा के मैदानों में नगरों, व्यापार और कला का पुनरुत्थान हुआ जिसे ‘द्वितीय नगरीकरण’ कहा जाता है। इसके प्रमाण पुरातात्विक उत्खननों तथा उत्तर-वैदिक, बौद्ध व जैन साहित्य से प्राप्त होते हैं।
महाजनपद काल के ‘आहत सिक्के’ (Punch-Marked Coins) क्या थे?
व्यापारिक विनिमय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए महाजनपदों द्वारा चाँदी जैसी धातु पर प्रतीकों या चिह्नों को ठप्पा मारकर (आहत करके) सिक्के बनाए गए। ये सिक्के भारत के विभिन्न भागों तथा विदेशों में विनिमय हेतु प्रयुक्त होते थे।
वज्जि और मल्ल महाजनपदों की शासन प्रणाली अन्य महाजनपदों से कैसे भिन्न थी?
मगध और कोसल जैसे राजतंत्रों के विपरीत वज्जि और मल्ल में गण या संघ आधारित गणतांत्रिक व्यवस्था थी। यहाँ सभा द्वारा राजा का चयन किया जाता था और सभी प्रमुख निर्णयों का निर्धारण मतदान द्वारा होता था।
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