कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 6, पुनर्गठन का काल: यह अध्याय मौर्योत्तर काल (दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तीसरी शताब्दी सा.सं.) के दौरान उपमहाद्वीप में नए राजवंशों के उदय, विदेशी आक्रमणकारियों के आगमन तथा कला और संस्कृति के पुनर्गठन का अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें भविष्या और ध्रुव की काल-यंत्र यात्रा, महाकाव्य ‘सिलप्पदिकारम्’ में कण्णगी और कोवलन की कथा, नानेघाट व कारले गुफ़ाओं, तथा कनिष्क की सिरविहीन मूर्ति व कुबेर की प्रतिमा का वर्णन किया गया है।
कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 6 (पुनर्गठन का काल): मुख्य बिंदु
शुंग और सातवाहन वंश शुंगों ने भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश) की सुंदर वेदिकाएँ और बौद्ध कलाकृतियाँ निर्मित कीं, जबकि महर्षि पतंजलि ने इसी काल में योग सूत्रों का संकलन किया। दक्कन क्षेत्र पर शासन करने वाले सातवाहनों की राजधानी अमरावती और प्रतिष्ठान (पैठन) थी, और उनके सिक्कों पर दो मस्तूल वाले समुद्री जहाजों के चित्र उत्कीर्ण मिलते हैं।
दक्षिण में साम्राज्य और संगम युग दक्षिण भारत में चोल, चेर और पांड्य वंशों का शासन था, जहाँ चोल राजा करिकाल ने कावेरी नदी पर ‘कल्लनई’ (ग्रैंड एनीकट) नामक विशाल जल-वितरण प्रणाली का निर्माण करवाया। संगम साहित्य के महाकाव्य ‘सिलप्पदिकारम्’ में कण्णगी और कोवलन की प्रसिद्ध कथा वर्णित है, और पांड्य राज्य मोतियों के व्यापार के लिए विख्यात था।
इंडो-ग्रीक आक्रमण और शक उत्तर-पश्चिम सीमा से आए इंडो-ग्रीक शासकों ने भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर सिक्के जारी किए, जिन पर वासुदेव-कृष्ण और लक्ष्मी के चित्र अंकित थे। विदिशा में इंडो-ग्रीक राजदूत द्वारा स्थापित हेलियोडोरस स्तंभ स्थित है, तथा शकों के आगमन के बाद 78 सा.सं. में ‘शक संवत’ प्रारंभ हुआ जिसे 1957 में भारतीय राष्ट्रीय पंचांग के रूप में अपनाया गया।
कुषाणों का उदय और कला शैलियाँ मध्य एशिया से आए कुषाण वंश के सबसे शक्तिशाली सम्राट कनिष्क थे, जिनकी 1.85 मीटर ऊँची सिरविहीन मूर्ति और सिक्कों पर महात्मा बुद्ध व शिवजी के चित्र मिलते हैं। कुषाण काल में रेशम मार्ग (सिल्क रूट) पर नियंत्रण स्थापित हुआ तथा गांधार कला (स्लेटी-काले शिस्ट पत्थर) और मथुरा कला (लाल बलुआ पत्थर) शैलियों का महान विकास हुआ।
अध्याय 6 के अभ्यास
- विद्यार्थी दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तीसरी शताब्दी सा.सं. तक की अवधि को चिह्नित करते हुए एक समय-रेखा बनाते हैं और उस पर प्रमुख राजाओं व घटनाओं को दर्ज करते हैं।
- विद्यार्थी भरहुत स्तूप की उत्कीर्ण पट्टिका के चित्र को देखकर उसमें चित्रित व्यक्तियों के व्यवसायों और परिधानों की पहचान कर कक्षा में चर्चा करते हैं।
- विद्यार्थी भारतीय उपमहाद्वीप के रेखांकित मानचित्र पर मौर्योत्तर काल की प्रमुख स्थापत्य कलाओं और ऐतिहासिक स्थलों को चिह्नित करते हैं।
कक्षा 7 समाज का अध्ययन अध्याय 6 के प्रश्न-उत्तर (हल)
प्रश्न 1. मौर्योत्तर काल को 'पुनर्गठन का काल' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: मौर्य साम्राज्य के विघटन के पश्चात पूर्ववर्ती क्षेत्रों का पुनर्गठन कर नवीन राज्यों (जैसे शुंग, सातवाहन, चोल, चेर, पांड्य, कुषाण आदि) का निर्माण हुआ जो निरंतर सत्ता व क्षेत्रीय नियंत्रण हेतु प्रतिस्पर्धा कर रहे थे
इस दौरान राजनीतिक शक्तियों के पुनर्गठन के साथ-साथ कला, स्थापत्य, व्यापार और संस्कृति में भी व्यापक परिवर्तन व पुनर्गठन हुआ।
प्रश्न 2. संगम साहित्य क्या है और इसका क्या महत्व है?
उत्तर: 'संगम' शब्द संस्कृत के 'संघ' से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ कवियों की सभा या समिति होता है
संगम साहित्य दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्य है जो तत्कालीन समाज-व्यवस्था, वीरता, उदारता तथा चोल, चेर और पांड्य शासकों के इतिहास के अध्ययन हेतु महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 3. इस अध्याय के अनुसार किन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया और क्यों?
उत्तर: सातवाहन शासकों जैसे गौतमीपुत्र शातकर्णी ने अपने नाम के आगे अपनी माता (गौतमी बलश्री) का नाम सम्मिलित किया
सातवाहन समाज में माताओं को विशेष सम्मान दिया जाता था और गौतमी बलश्री जैसी शक्तिशाली रानियाँ भूमि दान देने तथा अभिलेख उत्कीर्ण कराने में प्रभावी भूमिका निभाती थीं।
प्रश्न 4. भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश) की क्या विशेषता है और इसमें किस वंश का योगदान रहा?
उत्तर: भरहुत स्तूप का मूल निर्माण संभवतः सम्राट अशोक के काल में हुआ था, किंतु शुंग वंश के शासकों ने इसमें अत्यंत सुंदर वेदिकाएँ तथा महात्मा बुद्ध के जीवन की कथाओं को दर्शाते हुए शिल्प जोड़े जो बौद्ध कला के प्राचीनतम उदाहरणों में गिने जाते हैं।
प्रश्न 5. सातवाहनकालीन नानेघाट अभिलेख की क्या विशेषता है?
उत्तर: महाराष्ट्र के नानेघाट गुफ़ा में स्थित यह अभिलेख एक सातवाहन विधवा रानी पर केंद्रित है जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ सहित अनेक वैदिक अनुष्ठान करवाए थे
इसमें ब्राह्मी लिपि में अंकित संख्या चिह्न मिलते हैं जो आधुनिक भारतीय अंकों की उत्पत्ति का पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।
प्रश्न 6. चोल राजा करिकाल द्वारा निर्मित 'कल्लनई' (ग्रैंड एनीकट) की क्या विशेषता है?
उत्तर: चोल राजा करिकाल ने कावेरी नदी पर 'कल्लनई' (ग्रैंड एनीकट) नामक विशाल जल-वितरण प्रणाली का निर्माण करवाया था
यह कावेरी नदी के जल को नियंत्रित कर आसपास की कृषि भूमि की सिंचाई हेतु प्रयुक्त होने वाली प्राचीन जल-प्रबंधन संरचना है।
प्रश्न 7. संगम साहित्य के प्रसिद्ध महाकाव्य 'सिलप्पदिकारम्' में किसकी कथा वर्णित है?
उत्तर: 'सिलप्पदिकारम्' (पायल की कथा) में कण्णगी और उसके पति कोवलन की कथा वर्णित है, जो चोल राजधानी पुहार (कावेरीपट्टनम) से नए जीवन की शुरुआत करने पांड्य राज्य की राजधानी मदुरै गए थे।
प्रश्न 8. विदिशा के पास स्थित हेलियोडोरस स्तंभ का क्या महत्व है?
उत्तर: यह स्तंभ इंडो-ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस द्वारा भगवान वासुदेव-कृष्ण की स्तुति में स्थापित किया गया था
इस पर उत्कीर्ण अभिलेख से यह साक्ष्य मिलता है कि उत्तर-पश्चिम से आए विदेशी शासक और राजदूत भी भारतीय धर्म व संस्कृति में समाहित हो गए थे।
प्रश्न 9. 'शक संवत' की शुरुआत कब हुई और इसका वर्तमान में क्या उपयोग है?
उत्तर: उत्तर-पश्चिम से आए शकों के आगमन के पश्चात 78 सा.सं. (ईस्वी) में 'शक संवत' की शुरुआत हुई
वर्ष 1957 में भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय पंचांग के रूप में अपनाया जिसका प्रयोग सरकारी प्रकाशनों में ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ तिथियों को दर्शाने हेतु किया जाता है।
प्रश्न 10. कुषाण सम्राट कनिष्क की प्रसिद्ध 'सिरविहीन मूर्ति' पर ब्राह्मी लिपि में क्या उत्कीर्ण है?
उत्तर: कनिष्क की 1.85 मीटर ऊँची सिरविहीन मूर्ति पर ब्राह्मी लिपि में ‘महाराजा राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क’ उत्कीर्ण है, जिसका अर्थ ‘राजाओं के राजा, महाराजा, देवपुत्र कनिष्क’ होता है।
प्रश्न 11. गांधार कला शैली और मथुरा कला शैली किन-किन क्षेत्रों में विकसित हुईं तथा उनमें किन पत्थरों का प्रयोग हुआ?
उत्तर: गांधार कला शैली मुख्य रूप से पश्चिमी पंजाब व उत्तर-पश्चिम भाग में विकसित हुई जिसमें स्लेटी-काले शिस्ट पत्थर का प्रयोग हुआ
जबकि मथुरा कला शैली मथुरा क्षेत्र में विकसित हुई जिसमें मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर (रेड सैंडस्टोन) का प्रयोग किया गया।
प्रश्न 12. कुषाण साम्राज्य के समय चीन को भूमध्यसागरीय क्षेत्र से जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग को क्या कहा जाता था?
उत्तर: कुषाण साम्राज्य के समय चीन को मध्य-एशिया और फारस से होते हुए भूमध्यसागरीय क्षेत्र से जोड़ने वाले प्रमुख अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग को 'रेशम मार्ग' (सिल्क रूट) कहा जाता था।
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अन्य अध्याय
- Previous: Chapter 5: साम्राज्यों का उदय
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FAQ
मौर्योत्तर काल को ‘पुनर्गठन का काल’ क्यों कहा जाता है?
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में शुंग, सातवाहन, इंडो-ग्रीक और कुषाण जैसे अनेक नए देशी व विदेशी राजवंशों का उदय हुआ। इन विविध राजनीतिक शक्तियों के संघर्ष, व्यापारिक विकास तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कारण इस युग को पुनर्गठन का काल कहा जाता है।
सातवाहनकालीन नानेघाट अभिलेख की क्या विशेषता है?
पुणे के पास नानेघाट गुफ़ा में स्थित यह अभिलेख एक सातवाहन विधवा रानी पर केंद्रित है, जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ सहित अनेक वैदिक अनुष्ठान करवाए थे। इसमें ब्राह्मी लिपि में अंकित संख्या चिह्न मिलते हैं, जो आधुनिक भारतीय अंकों की उत्पत्ति का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
गांधार और मथुरा कला शैली में मुख्य अंतर क्या हैं?
गांधार कला शैली पश्चिमी पंजाब में स्लेटी-काले शिस्ट पत्थर से विकसित हुई जिसमें ग्रीक-रोमन प्रभाव दिखता है। इसके विपरीत मथुरा कला शैली में लाल बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ और इसमें बुद्ध, शिव, लक्ष्मी व कुबेर की विशुद्ध भारतीय मूर्तियाँ बनाई गईं।
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